Wednesday, February 8, 2023

तरुणाई आ गई

 मेरे हिस्से की पूरब में

 लाली आ गई ,

देखो कैसे चेहेरे पर 

खुशहाली आ गई,

चलो सभी कुछ कदम

 फिर साथ चले ,

सुबह की बयार और 

हरियाली आ गई ,

अंधेरो से निजात 

बंद आँखों ने दिया ,

आलोक की सौगात 

उसको भी आ  गई ,

चलो कुछ देर गा ले 

अब  सांसो के गीत ,

उम्र से हार करहर कही 

तरुणाई आ गई  ।

.



आलोक चांटिया

भगवान भी अब कपड़े पहनने लगा है

 

भगवान भी अब कपडे पहनने लगा है ,
भगवान अब खाना भी खाने लगा है ,
भगवान भी हवा के लिए व्याकुल है ,
भगवान झुके सर देखने को आकुल है ,
भगवान भोर होने का इंतज़ार करता है ,
भगवान सोने का भी इकरार करता है ,
भगवान से अब  डर भी  लगने लगा है ,
भगवान अब जो  से मनुष्य बनने लगा है ,
भगवान को अमीर गरीब दिखने लगा है ,
भगवान अब अंधेरो से भी डरने लगा है ,
भगवान को सूखी रोटी नही सुहाती है ,
भगवान मोटर कारो में सजने लगा है ,
भगवान को भी अब सुख की चाहत है ,
एक झोपडी में कोई मन आज आहत है ,
कितना पुकारा अपने मरते बेटे के लिए ,
भगवान तो थे बैठे कही बिकने के लिए ,
भगवान मंदिर में बैठ तुम क्यों हो मौन
क्या देखते नही पुकारता है कौन कौन ,
जड़ चेतन लाचार दीन के तुम ही सहारा ,
पर आज इन सब का मन ऐसे क्यों हारा,
कही तुम भी उसी  मनुष्य के सर्व दाता हो ,
जो लूट घसोट भ्रष्टाचार के संग  आता हो ,
तब समझ गया आलोक कलयुग आ गया ,
नेता ही भगवान का अब हर पद पा गया ...............
आलोक चांटिया

...न जाने कितनी खाई हमने खीच दी है आदमी आदमी के बीच और चाह कर भी भवन इतना मौन हो गया है की देश के हर गलत आदमी नेता बन कर भगवान बन रहा है .अपर आप इसे रोक सकते है ...एक मत से नेता और भगवान में फर्क कर सकते है ...यही अखिल भारतीय अधिकार संगठन का प्रयास और पुकार है .

Monday, February 6, 2023

अंतिम कविता

 



आज ये अंतिम  मेरी कविता है ,

आज ना खुश दिखती सविता है ,

अंशुमाली निरंकुश रहता मिला ,

अंशु का दिल फिर क्योंना खिला  ,,

रजनीश को देख बंद आँखे हुई ,

आलोक से बेपरवाह दुनिया हुई ,

जी लेने की चाह बस सबमे दिखी,

चौपायो की बेहतर किस्मत लिखी  ,

जाने हम कैसे मनुष्य बन ही  गए  ,

बैठे जिस जगह वो और मैले हो गए ,

कहते है फर्जी सब करते है बात,

लाया  ना ठेका कोई अपने साथ ,

गाँधी भगत थे  आये यही बताने

दुनिया बनाओ सुंदर इसे ही जताने ,

मिली क्या उनको फासी और गोली ,

आलोक अब क्यों करते हो ठिठोली ,

आदमी अगर सच आदमी ही होता ,

जंगल जानवर धरा से यू ना खोता ,

अब तो नदी , जमीं सब रो रहे है ,

देखते नही सब अब ख़त्म हो रहे है ,

बनेगा फिर कौन राम की विरासत  ,

स्वयं हो गया आदमी एक आफत ,

पहले बताओ इनको जीवन का अर्थ ,

सामने खड़ा ही अस्तित्व का अनर्थ ,

जानते नही ये अब किधर जा रहे है ,

सुबह भी हो रही है इनके लिए तदर्थ ..

आइये हम पहले मनुष्य होने का मतलब समझे और यह जाने कि सिर्फ हमारे दुनिया में रहने का कोई फायदा  नही अगर जंगल, जानवर , नदी नाले सब ख़त्म हो गए

आलोक चांटिया

Sunday, February 5, 2023

औरत और चिड़िया

 एक चिडिया उडी आकाश में ,

एक चिडिया उडी प्रकाश में ,

साँझ का मतलब जानती है ,

अंधेरो को भी पहचानती है ,

नन्हे पर लेकर ही जीती है ,

अजब सा साहस वो देती है ,

वो निकलना कब छोडती है  ,

अपने रास्ते कब मोडती है ,

तुम चिडिया से कम नही ,

क्या तुम में कोई दम नही,

बदल डालो अपना आकाश ,

बनो लो अपने नए प्रकाश ,

साँझ से पहले संभल जाओ,

पूरब की लाली फिर बन जाओ,

ना करो भरोसा किसी पर इतना,

दूर रहो उनसे भ्रष्टाचार से जितना ,

चिडिया बाज़ से निकल जाती है ,

परगंगा को मैला निगल जाती है ,

रात को आओ फिर से समझ ले ,

मुट्ठी में आलोक पूरब से ले ले ।


आलोक चांटिया

Saturday, February 4, 2023

औरत भी आदमी है

 आज मै भी मंदिर मे 

घंटिया बजा आया हूँ ,

भगवान को सोते से 

अभी जगा आया हूँ ,

जब से आप भी 

मेरी तरह सोने लगे है ,

शहर में हर रात कितने

 क़त्ल होने लगे है ,

देखो मांग में सिंदूर भरे

 लटो से गिरती बूंदे,

लेकर सृजन की देवी भी

 पूजा करने आई है ,

फिर भी कल रात

 एक चीख सुनने में आई है ,

शायद दहेज़ ने एक लड़की 

जिन्दा फिर खाई है ,

कितने मन से पुकारा था

 द्रौपदी को याद करके ,

फिर उससे हिस्से में 

 नग्नता की क्यों आई है ,

कितनी ही इंतज़ार में बैठी

 स्वर्ग में बने रिश्तो के,

क्या उनके हाथ में तुमने

 वो रेखा भी बनाई है ,

कुंती की तरह डर से  

सड़क पर पड़े करण के शव ,

क्या माँ बन ने का अधिकार 

वो खुद पाई ले है ,

भगवान अब आलोक की

  विनती बस इतनी तुमसे ,

अब रात में फिर कभी ना 

सो जाना मनुष्य की तरह ,

दिन के उजालो में तुमपर 

जीने वालो को बता दो ,

औरत भी साँस लेती है 

ठीक तुम्हारी  हमारी तरह ।


आलोक चांटिया

.आपको ऐसा लगता है कि मै रात दिन कविता कहानी लिखता हूँ तो ऐसा नही है ....बस कुछ देर इस बात के एहसास में कि मनुष्य होने का मतलब समझ लू आपके साथ अपनी दो लीनो के साथ आ जाता हूँ और आप में ही वो भगवान पता हूँ जिस से मै अभी विनती कर रहा था ..............आज का दिन आप सभी के लिए सुभ हो ऐसी कि कल्पना अखिल भारतीय अधिकार संगठन की है .....

Friday, February 3, 2023

भूल गए हैं हम

 ऐसा नही है कि लोग

 मुस्कराना भूल गए है ,

बस जलते हुए घर को 

बुझाना भूल गए है ,

जिन्दगी कुछ इस तरह

 दौड़ती भाग रही है ,

गिरते हुए लोग को हम

 उठाना भूल गए है  ,

रात को भी दिन समझ 

काम से है जूझ रहे ,

आलोक के राग पर हम

 गुनगुना भूल गए है ,


आलोक चांटिया

Thursday, February 2, 2023

पूरब का दर्शन भर दो

 दिन भर मुट्ठी में 

उजाला पकड़ता रहा ,

फिर  भी  क्यों मन 

अँधेरे से डरता रहा ,

पग ने भी जाने कितना 

पथ चल डाला ,

कहते जीवन को

 अब भी है , मधु शाला ,

 सृजन का असली 

मतलब तारे समझाए 

देख निशा के संग 

कुछ सपने भी है आये ,

बुन कर इनको फिर

 नींद के रंग से भर दो ,

सांसो की वीणा से 

मन्त्र मुग्ध सा कर दो ,

आलोक की आहट सोच

 रात छोटी हो जाये ,

हर आँखों का स्वप्न 

पूरब का दर्शन भर दो ।


आलोक चांटिया