Thursday, September 4, 2025

जैसे-जैसे मन ज्ञान में, डूबता चला जाता है - आलोक चांटिया रजनीश


 

जैसे-जैसे मन ज्ञान में,
डूबता चला जाता है ।
जीवन उतना ही,
ऊबता चला जाता है।
लगता है हाथ की सारी रेखाएं ,
मेरी ही हथेली में निकल आई है ।
पर दौड़ते भागते डगर में,
भला वह क्या पाई है?

 जानकार हर दिन कि कौन सा,
दर्द क्या कहलाता है ?
पूरा शरीर ही ऐसा लगता है,
जैसे बीमारी में बंधा चला जाता है।
ज्ञान की खुदाई कर,
दिमाग यह समझ जाता है।

 किसी के दिल के साथ,
फरेब कैसे किया जाता है?

 न्यायालय कचहरी में भी ज्ञान का,
असर ऐसा दिखाई देता है।

 कि हत्या करने वाला भी , 

बाइज्जत बरी हो जाता है। 

कभी-कभी ऐसा लगता है,

 परम तत्व के बहुत नजदीक पहुंच गया हूं।
उस पल सब कुछ,
इस दुनिया में झूठ नजर आता है ।
समझ में आता ही नहीं,
फिर हर कोई ज्ञान क्यों चाहता है ?
अगर पाप को सर चढ़कर ही बोलना है ?
तो भला पाप किया ही क्यों जाता है?
ज्ञान बूंद बूंद करके,
इतना ज्यादा हो गया है।
गर्भ में पलता बच्चा ,
अब नदी नाले में खो गया है।
कोई नहीं मानता कि गर्भ में कोई,
भगवान पल रहा होगा! 

उसके ज्ञान के विस्तार में,

 गर्भ को बर्बाद कर दिया जाता है ।
किसी भूखे को देखकर हम अपना निवाला,
छुपाने की आदत में चलने लगे हैं।
क्योंकि कल के ज्ञान से, 

इतना डरा दिया जाता है। 

स्वर्ग नरक अब कहीं नहीं होता है,
यह जान गए हैं सब ।
क्योंकि एक अपराधी का जीवन,
राजा की तरह जिया जाता है।
इसीलिए शायद दुनिया के लोग,
ज्यादातर अनपढ़ रह जाते हैं ।
ज्ञान के बाद तो वह,
और ज्यादा दर्द पाते हैं। 

आलोक चांटिया "रजनीश"

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