Thursday, September 25, 2025

जिन रास्तों पर तुम, चले जा रहे हो- आलोक चांटिया "रजनीश"

 

जिन रास्तों पर तुम,
चले जा रहे हो.
उन रास्तों पर समय को, 

पीछे छोड़ जा रहे हो ।
चाहोगे तो फिर मुठ्ठी में,
नहीं बांध पाओगे,
इस समय को अपने लिए। 

जी जाओ आज इस दुनिया में,
और सोचो आए हो किसके लिए?
समय का आभास भी,
जब तुमको हो पाएगा,
तो दर्पण का संदेश,
तुम्हें यही बात जाएगा। 

झुकी हुई कमर,
चेहरे पर छाई झुर्रियां,
और कमजोर होती दृष्टि में,
एक पश्चाताप रह जाएगा। 

इसीलिए रुक कर सोचो,

 समझो और करो ,
उस पथ का निर्माण ।
जिस पर तुम स्वयं हो और वह हो ,
जिसे समाज द्वारा सराहा जाएगा ।
यह समय फिर से,
वापस नहीं आएगा। 

यह वह खोया हुआ धन नहीं है, 

जो तुम ढूंढ कर फिर से, 

पाने की जुगत कर लो।
फिर से इसे किसी तिजोरी में,
या अपनी मुट्ठी में कर लो। 

यह तो हवा भी नहीं है,
जो फिर से चलकर आ जाए।
यह समय है एक ,
और सिर्फ एक बार आता है,
किसी के भी जीवन में।
फिर क्या पता यह तुमसे, 

क्या अच्छा क्या बुरा करा जाए ।
इसीलिए इस समय को महसूस करने की,
एक आदत आज से ही पाल लो ।
यही ईश्वर है यही ब्रह्मांड है, 

इसे ही सब कुछ मान लो ।
आलोक चांटिया "रजनीश"

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