Sunday, September 28, 2025

जो हर दिन खत्म हो रहा है आलोक चांटिया "रजनीश"

जो हर दिन खत्म हो रहा है, 
इस संसार में वह और,
कुछ भी नहीं जीवन है ।
हम चाह कर भी जिसे ,
रोक नहीं सकते इस संसार में ,
वह कुछ भी नहीं जीवन है।
सिर्फ और सिर्फ एक ही,
 रास्ता शेष है उसे रोक पाने का,
इस संसार में वह कर्म है।
जो हर पल है निभाना ,
बस यही मानव का धर्म है। 
छोड़कर जो भी जाएगा, 
अपने पीछे एक विचार, 
आने वाली पीढ़ियां के लिए।
वही तो रोशनी देंगे समय के साथ,
बनाकर एक दिए।
इसीलिए मुट्ठी में हम बांध कर,
क्या ले आये यह
समझना जरूरी नहीं है। 
मुट्ठी में हमने कर्म की जो रेखाएं,
खींच रखी है उन्हें कितना इस धरा पर,
खींचा है यह जरूरी है। 
आओ मिलकर एक बार, 
यह जतन कर ले अपने कर्म को,
निभाते हुए इस नश्वर जीवन को,
कर्म के धर्म को।
मरे क्यों हम चार दिवारी परिवार तक ही,
याद रखने की जुगत में, 
फंसे रहते हैं ?
क्यों नहीं हम पूरी दुनिया के हैं,
यह हर पल कहते हैं! 
इसीलिए धरा पुत्र बनकर, 
जीने का प्रयास कर डालो। 
और नश्वर शरीर को अपने कर्मों से,
यहां अमर कर डालो। 
आलोक चांटिया "रजनीश"

 

Thursday, September 25, 2025

जिन रास्तों पर तुम, चले जा रहे हो- आलोक चांटिया "रजनीश"

 

जिन रास्तों पर तुम,
चले जा रहे हो.
उन रास्तों पर समय को, 

पीछे छोड़ जा रहे हो ।
चाहोगे तो फिर मुठ्ठी में,
नहीं बांध पाओगे,
इस समय को अपने लिए। 

जी जाओ आज इस दुनिया में,
और सोचो आए हो किसके लिए?
समय का आभास भी,
जब तुमको हो पाएगा,
तो दर्पण का संदेश,
तुम्हें यही बात जाएगा। 

झुकी हुई कमर,
चेहरे पर छाई झुर्रियां,
और कमजोर होती दृष्टि में,
एक पश्चाताप रह जाएगा। 

इसीलिए रुक कर सोचो,

 समझो और करो ,
उस पथ का निर्माण ।
जिस पर तुम स्वयं हो और वह हो ,
जिसे समाज द्वारा सराहा जाएगा ।
यह समय फिर से,
वापस नहीं आएगा। 

यह वह खोया हुआ धन नहीं है, 

जो तुम ढूंढ कर फिर से, 

पाने की जुगत कर लो।
फिर से इसे किसी तिजोरी में,
या अपनी मुट्ठी में कर लो। 

यह तो हवा भी नहीं है,
जो फिर से चलकर आ जाए।
यह समय है एक ,
और सिर्फ एक बार आता है,
किसी के भी जीवन में।
फिर क्या पता यह तुमसे, 

क्या अच्छा क्या बुरा करा जाए ।
इसीलिए इस समय को महसूस करने की,
एक आदत आज से ही पाल लो ।
यही ईश्वर है यही ब्रह्मांड है, 

इसे ही सब कुछ मान लो ।
आलोक चांटिया "रजनीश"

Thursday, September 11, 2025

संबंधों का रेगिस्तान -आलोक चांटिया "रजनीश"


 संबंधों का रेगिस्तान बड़ा है,

 अंतहीन इंसान सामने खड़ा है ।

है भी और नहीं भी है,

किसी तरह से मेरे लिए।

 उजाला सा संबंधों का वीरान पड़ा है ।

हर कोई जीता है बस रात दिन,

हर पल यही सोच कर।

जी लूंगा मैं भी थोड़ा संबंधों को,

किसी के साथ जोड़कर।

पर बंद मुट्ठी में अंधेरा ही आता है।

जब कोई चुपचाप संबंधों को,

ले जाता है नोच कर ।

जितनी भी हरियाली छाया संबंधों की,

सोच कर आगे बढ़ता रहता है ।

कोई भी तप्ती बालू की रेत में,

तन जलता है मन जलता है, 

जल जाते हैं पैर,

बस यही सोचकर ।

संबंधों का रेगिस्तान ही,

क्यों बढ़ रहा है?

क्यों आदमी जीकर,

इसके साथ भी मर रहा है।

इसके न होने पर भी खुश, 

कहां रह पा रहा था ?

इसको बनाकर भी ,

शहर क्यों जल जा रहा था? 

संबंध कश्मीर से कन्याकुमारी की तरह,

फैल गए हैं ।

फिर भी रेगिस्तान में एक बूंद,

पानी को हम क्यों तरस गए हैं?

क्यों नहीं इस रेगिस्तान में कभी,

सरसता का एहसास भी आता है ?

मनुष्य पशु जगत में संबंधों का,

बोझ लेकर कहां से आता है?

उसे बस संबंधों से थोड़ी सी ठंडक ,

ढलते सूरज के साथ ,

रात के अंधेरे में,

ठंडी होती रेत में मिल भी जाती है ।

पर संबंधों का रेगिस्तान, 

उजाला चाहता है ।

और उजाले में सिर्फ और सिर्फ,

फिर वही गर्मी आई है जिससे ,

बचने का तरीका ढूंढा जाता है ।

समझ में नहीं आता प्रकृति में,

यह रेगिस्तान क्यों बनाया जाता है ?

संबंधों का गान क्यों गया जाता है ?

आलोक चांटिया "रजनीश"


Monday, September 8, 2025

मेरी नींद आज न जाने, कहां भाग गई है - आलोक चांटिया रजनीश

मेरी नींद आज न जाने,
कहां भाग गई है ।
शायद एक बार फिर,
मेरी आत्मा जाग गई है। 

मदहोश जब बेखबर होकर, 

दुनिया से मैं सो जाता हूं। 

किसको बताऊं सपनों में,
मैं किसे पाता हूं ?
अक्सर मेरी मां आकर,
अभी भी मुझे समझा जाती है ।
क्या तुम्हें यह न्यूनतम सी बात भी,
समझ में नहीं आती है! 

फस जाते हो बार-बार,
उन्हीं भंवर जाल में,
तुम क्यों इस तरह।
जबकि रास्ता सिर्फ एक ही सच है,
क्यों नहीं मिलते तुम उस तरह ।
इस तरह मुट्ठी को बार-बार खोलकर,
देखना अच्छी बात नहीं है। 

अंधेरे से भागना,
कोई सच्ची बात नहीं है।

 पकड़ कर कब तक रखोगे? 

प्रकाश को इस भ्रम में,
कि वह मुट्ठी में बंद हो जाता है ?
जब सब छोड़ देते हो,
तब खुले हाथों में ही वह रह पाता है ।
बंद मुट्ठी तो अंधेरों का सागर है ।
पकड़ने के लिए दौड़ना ही, 

एक भवसागर है ।
इसलिए चुपचाप जिस आत्मा को,
शरीर में बंद किया है ।
उसको ही सच मानकर चलते रहना,
और किसी भी चीज को बार-बार,
अपना कहने के भ्रम में ना रहना ।
यह दुनिया ना कल तुम्हारी थी।
ना आज है ना कल रहेगी। 

शरीर भी यही रह जाएगा। 

सड जाएगा गल जाएगा।

 कोई को याद भी नहीं रह जाएगा।
खत्म होने से पहले उस शरीर को,
तुम आत्मा के साथ जितना घिस डालोगे।
उतना ही सुंदर सुख शांति का रत्न,
तुम अपनी उस यात्रा में पा डालोगे ।
इसलिए जब भी तुम्हारी नींद,
तुम्हारे पास से भाग जाए।
और शरीर में बैठी आत्मा, 

फिर से जाग जाए ।
तो समझ लेना तुमने एक बार फिर से ,
सच को समझ लिया है।

 मानव होने का अर्थ सच में ,
इस पृथ्वी को दिया है आलोक चांटिया "रजनीश"

 

थक हार कर अंधेरे का, - आलोक चांटिया "रजनीश"


 

थक हार कर अंधेरे का, 

सहारा लेना ही पड़ता है ।
कुछ ना समझ आने पर, 

आंख बंद करना ही पड़ता है।
मान लेना पड़ता है कि कल सुबह,
फिर से अपने लोगों को मैं देख पाऊंगा ।
जब आंख खोल कर,
सभी के सामने आऊंगा। 

इतने विश्वास के बाद भी कोई,
कह नहीं पाता कि,
सभी को भगवान पर विश्वास रहता है।
और जिसे भी देखो वह,
यह पूछता रहता है ।
भगवान कहां रहता है? 

भगवान को देखा किसने है?

 चरम सुख की चाहत का यह प्रश्न,
जीवन में हर तरफ चल रहा है।
जिसे भी देखिये वह,
सत्य की खोज कर रहा है। 

मुट्ठी बंद करना मुट्ठी खोलकर देखना,
सुबह से शाम तक ,
आदमी का प्रयास रह जाता है।
मनचाहा ना पाने पर कोई अपने,
घर के दरवाजों में सिमट जाता है।
कोई सब कुछ कल पर छोड़कर ,
सो जाता है ।
कल को देखने का सपना, 

पूरा होगा या अधूरा रह जाएगा,
यह सिर्फ और सिर्फ समय बताता है ।
फिर भी समय का आभास, उसकी महत्ता,
कहां कोई समझ पाता है? 

रोज रात को आंख बंद करके,
सोने वाला यह एहसास दिखा जाता है ,
अपनों के साथ होने का आभास,
दूसरे दिन की सुबह में लेकर कोई,
चुपचाप गहरी नींद में खो जाता है।
आदमी हमेशा किसी और के सहारे,
जीता रहा है जीता रहेगा, 

यह कभी कह नहीं पाता है। 

आलोक चांटिया "रजनीश"

जब मुझको जाना ही है एक दिन,- आलोक चांटिया रजनीश

जब मुझको जाना ही है एक दिन,

तो कब तक बटोरता रहूं?

जो अपने मुट्ठी में इकट्ठा कर लिया है ,

उसको किसी से तो कहूं!

पर हर कोई इकट्ठा करने में ही,

लगा दिखाई देता है।

फिर उससे मैं रुकने के लिए कैसे कहूं ?

मालूम सभी को है कि दौड़ते दौड़ते,

एक दिन किनारा आ जाएगा ।

और लौट के सिवा,

फिर कुछ ना रह पाएगा।

फिर भी कोई ना सुनना चाहता है,

ना भूलना चाहता है, 

ना गुनना चाहता है।

बस एक जिद है सब कुछ, 

इकट्ठा कर लेने की ।

इसी में डूब जाना चाहता है।

 शायद यही कारण है कि एक दिन,

जब वह पलट कर देखता है,

तो दूर तक एक सन्नाटे के सिवा,

कुछ भी नहीं पाता है ।

और स्वयं गूंगा हो जाता है, 

यह बता नहीं पाता है कि वह,

इस संसार में क्यों आता है?

मनुष्य इकट्ठा करने में एक चिड़िया,

क्यों नहीं बन पाता है?

जो सिर्फ सुबह उड़कर शाम को अपने,

घोंसले में लौट आई है ।

चोंच में दबे हुए भूख के ज्ञान से सिर्फ,

उसी दिन का हिसाब लगाती है ।

इस ज्ञान को मानव,

क्यों नहीं समझ पाता है ?


वह चींटी की तरह इकट्ठा करने में ही,

क्यों लगा रह जाता है ?

और अचानक एक दिन, 

कुचल दिया जाता है ।

मसल दिया जाता है,

जो उसने इकट्ठा किया था, 

वह कहां किसी को दिखा पाता है?

कहां किसी को बता पता है?

मानव मानव होने के अर्थ को ,

इस पृथ्वी पर कहां समझा पाता है?

एक चिड़िया से बौना और, 

एक चींटी का जीवन,

लेकर चला जाता है ।

इकट्ठा करने की जुगत में, 

आखिर मानव किस अनंत काल के लिए,

इस संसार में आता है ?

आलोक चांटिया "रजनीश"


 

Thursday, September 4, 2025

जैसे-जैसे मन ज्ञान में, डूबता चला जाता है - आलोक चांटिया रजनीश


 

जैसे-जैसे मन ज्ञान में,
डूबता चला जाता है ।
जीवन उतना ही,
ऊबता चला जाता है।
लगता है हाथ की सारी रेखाएं ,
मेरी ही हथेली में निकल आई है ।
पर दौड़ते भागते डगर में,
भला वह क्या पाई है?

 जानकार हर दिन कि कौन सा,
दर्द क्या कहलाता है ?
पूरा शरीर ही ऐसा लगता है,
जैसे बीमारी में बंधा चला जाता है।
ज्ञान की खुदाई कर,
दिमाग यह समझ जाता है।

 किसी के दिल के साथ,
फरेब कैसे किया जाता है?

 न्यायालय कचहरी में भी ज्ञान का,
असर ऐसा दिखाई देता है।

 कि हत्या करने वाला भी , 

बाइज्जत बरी हो जाता है। 

कभी-कभी ऐसा लगता है,

 परम तत्व के बहुत नजदीक पहुंच गया हूं।
उस पल सब कुछ,
इस दुनिया में झूठ नजर आता है ।
समझ में आता ही नहीं,
फिर हर कोई ज्ञान क्यों चाहता है ?
अगर पाप को सर चढ़कर ही बोलना है ?
तो भला पाप किया ही क्यों जाता है?
ज्ञान बूंद बूंद करके,
इतना ज्यादा हो गया है।
गर्भ में पलता बच्चा ,
अब नदी नाले में खो गया है।
कोई नहीं मानता कि गर्भ में कोई,
भगवान पल रहा होगा! 

उसके ज्ञान के विस्तार में,

 गर्भ को बर्बाद कर दिया जाता है ।
किसी भूखे को देखकर हम अपना निवाला,
छुपाने की आदत में चलने लगे हैं।
क्योंकि कल के ज्ञान से, 

इतना डरा दिया जाता है। 

स्वर्ग नरक अब कहीं नहीं होता है,
यह जान गए हैं सब ।
क्योंकि एक अपराधी का जीवन,
राजा की तरह जिया जाता है।
इसीलिए शायद दुनिया के लोग,
ज्यादातर अनपढ़ रह जाते हैं ।
ज्ञान के बाद तो वह,
और ज्यादा दर्द पाते हैं। 

आलोक चांटिया "रजनीश"

Tuesday, September 2, 2025

सच तो बस यही है आलोक चांटिया "रजनीश"


 हर कोई निकलते बैठते,

सोते जागते चलते गिरते,

 यही समझा कर निकल जाता है।
काम अच्छा करते रहो,
यही काम सबके आता है। 

पर यही सोचकर गंगा भी, 

गंगोत्री से निकलकर लोगों को,
अमर करने चली आई।

 बदले में सिर्फ और सिर्फ, 

अपने आंचल को मैला करने के सिवा,
यहां क्या वह पाई ?
सांस बनकर मलय समीर भी बिना,
किसी लाभ हानि के लोगों के,
जीवन से होकर बहने लगी सांस बनकर।
पर उसकी अच्छे कामों को लोगों ने,
लौटाया है प्रदूषण बनकर।
मिट्टी भी तो यही चाहती है रही,
कि वहां अपने अंदर से सृजन की,
देवी बनकर रह जाए।

 हरियाली का एक ,
सुंदर सा अर्थ बन जाए।
पर बदले में उसके गोद में सिर्फ,
बंजर होना सूखा होना, 

रेगिस्तान बन जाना ही क्यों आए ?
इस भ्रम में रखकर ही शायद,
प्रकृति में हम अच्छे को अच्छा बनाकर,
रखने का प्रयास करते रहते हैं ।
पशु जगत में आदमी को, 

पशु से थोड़ा ऊपर लाने का, 

प्रयास करते रहते हैं।
बस यही एक दर्शन इस, 

जीवन का सच बन जाता है। 

वरना गंगा वायु पानी मिट्टी, 

सभी के हिस्से में क्या आता है ?
भला यह कौन नहीं जानता है !
और कौन इस कड़वे सच को कह पाता है
आलोक चांटिया "रजनीश"