मेरे पास शब्दों के सिवा ,
कुछ भी नहीं है ,
कुछ लोग कहते हैं कि ,
इससे बड़ा कुछ भी नहीं है ,
मैं सिर्फ तुमको दे सकता हूं ,
इन्हीं को जी भर के ,
तुम चाहो तो इससे नहा कर ,
अपने को ताजा कर लो ,
और जीवन के कुछ अर्थ ,
तुम भी अपने मुट्ठी में भर लो ,
मुझे नहीं मालूम मेरे शब्दों को,
देखकर तुम हंसते हो ,
रोते हो ,गाते हो या पागल समझकर ,
आगे निकल जाते हो,
मैंने तो सीखा है सिर्फ जो भी ,
तुम्हारी मुट्ठी में है ,
उसे देते चले जाओ ,
एक पल भी यह मत सोचो कि,
देने के बाद तुम क्या पाओ?
इस पृथ्वी पर जो भी ,
तुमको मिल रहा है ,
तुम्हारे अंदर उर्जा का ,
जो संचार खिल रहा है ,
वह सिर्फ तुम्हारे लिए ही नहीं बना है !
उन्हें अपने जरूरत के अनुसार ,
प्रयोग करके इसी दुनिया में ,
वापस करके जाना है,
इसी का नाम जीवन है ,
और इसी का नाम ,
मानव का जीवन पाना है ,
इसीलिए मेरे शब्दों से अगर,
तुम नहाना चाहते हो ,
और जीवन के कुछ स्वर ,
संगीत की तरह सुन जाना चाहते हो ,
तो मेरे शब्दों को गीता, रामायण ,
कुरान, भागवत, बाइबल,
समझकर सुनकर ,
अपने मतलब का उसमें से चुनकर,
थोड़ा सा मुस्कुराने की तरफ चले जाओ, आओ आओ मेरे पास,
जो शब्द रखे हैं, पड़े हैं ,
जिन्हें मैंने सजा कर रखा है,
उनको तुम भी थोड़ा सा ले जाओ ,
क्योंकि शब्द ही तो ब्रह्म होते हैं ,
और उनके अर्थ कभी भी ,
कहां कम होते हैं ,
बस यही तुम अगर समझ जाओ ,
तो दुनिया की हर संपत्ति से ज्यादा,
मेरे अर्थ को तुम भर भर के ले जाओ ,
तुम भर भर के ले जाओ ।
आलोक चांटिया "रजनीश"
Thursday, April 2, 2026
मेरे पास शब्दों के सिवा कुछ भी नहीं डॉ आलोक चांटिया रजनीश
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