Thursday, March 5, 2026

बीज का अकेलापन— डॉ. आलोक चांटिया "रजनीश"

 

बीज का अकेलापन

एक बीज की स्वतंत्रता,

जमीन के अंधेरे में खो जाती है,

मिट्टी की चुप तहों में उसकी

पहली सांस ही सो जाती है।

वह अकेला है —

पर हार मानना उसे आता नहीं,

जड़ कह दे संसार भले,

वह जड़ होकर भी ठहरता नहीं।

धरती के गहरे अंधकार से

वह प्रतिरोध रचता है,

मौन में छिपे साहस से

हर बंद दरवाज़ा कचोटता है।

कहते हैं उसे जड़ सभी,

निष्प्राण, मौन, हारा हुआ—

पर भीतर उसका स्वप्न

अभी भी है अंगारा हुआ।

वह लड़ता है मिट्टी से,

वह लड़ता है रात से,

वह जूझता है अपने ही

भीतर के हर आघात से।

और एक दिन —

जड़ों की ताकत लेकर,

धरती की छाती चीर,

वह बाहर आता है बढ़कर।

पहली बार फिर से

सूरज को देख पाता है,

किरणों की उंगलियों से

जीवन को छू पाता है।

पर क्या संघर्ष यहीं थमता है?

नहीं — कहानी यहीं नहीं रुकती,

वह अपनी जड़ों से बंधा हुआ,

मिट्टी में ही अपनी नियति लिखती।

वह फिर भी बढ़ता जाता है,

अकेलेपन को पीछे छोड़ने को,

ऊपर, और ऊपर उठता है

आकाश को थोड़ा-सा तोड़ने को।

समय बीतता है —

वह पौधा कहलाता है,

टहनियों की भुजाएँ फैलाकर

पत्तों से भर जाता है।

फिर एक दिन

समाज उसे पेड़ कहता है,

उसकी छाया में थका पथिक

अपना माथा सहलाता है।

उस पर पक्षी घर बनाते हैं,

किसी को लकड़ी मिल जाती है,

किसी को फल, किसी को आस,

किसी की दुनिया बस जाती है।

पर जो आज विशाल वृक्ष है,

वह याद करे तो जानता है—

अपने अकेलेपन से लड़कर ही

वह इतना बड़ा बन पाता है।

और अंत में क्या उसके हिस्से?

ऊपर जाना फिर रुक जाता है,

एक ऊँचाई के बाद वृक्ष

आकाश नहीं छू पाता है।

वह चुपचाप खड़ा रहता है,

परिस्थितियों से समझौता कर,

संघर्ष में जो भी पाया था,

उसी को जीवन मानकर।

छाया, भोजन, आश्रय देकर

दुनिया को वह जीता है,

पर भीतर कहीं अकेलापन

अब भी मौन संगीत-सा रीता है।

वह अक्सर हवा से कहता है —

“जब जीवन तुम्हें भी अकेला करे,

जब विरोध के स्वर में

सब कुछ तुमसे ले ले जगत भरे,

तब हार मत मानना तुम,

भले ही सब कुछ खो जाए,

अपने भीतर एक बीज रोपना,

जो वृक्ष बनकर सो जाए।

अकेलापन शाप नहीं,

संघर्ष का प्रथम चरण है,

जमीन के अंधेरे से ही

उगता उजला जीवन है।”

पर प्रश्न अभी भी बाकी है —

क्या कोई मनुष्य समझ पाता है?

बीज के इस मौन युद्ध को

क्या कोई पढ़ पाता है?

धरती के अंधेरे से उठकर

जो वृक्ष विशाल बन जाता है,

क्या कोई उसके अकेलेपन का

मूल्य कभी जान पाता है?

— डॉ. आलोक चांटिया "रजनीश"

मुट्ठी में अंधेरा-— डॉ. आलोक चांटिया "रजनीश"

 मुट्ठी में अंधेरा

मैं अपना दर्द

किसी को बताता नहीं हूं।

हंसने के सिवा,

किसी के सामने आता नहीं हूं।

जानता हूं सभी के,

चेहरे पर उदासी ही तो छा रही है।

एक दर्द की लकीर भी,

खींची सी चली जा रही है।

हर कोई दूसरे को देखकर,

बस कुछ सुनाना चाहता है।

दर्द न जाने कितने

रूपों में बाहर आना चाहता है।

रोशनी में रहकर भी,

सभी अंधेरे में खड़े नजर आ रहे हैं।

टटोलते हुए न जाने,

किसे ढूंढते जा रहे हैं।

आंख है पर दिखाई,

कुछ भी नहीं दे रहा है।

समय यह कैसा,

सभी का इम्तिहान ले रहा है।

मनुष्य हंस सकता है,

जानते सभी हैं।

पर क्या चेहरे पर,

उन्हें लाते भी कभी हैं?

यह कौन सा श्राप मनुष्य

जीने के लिए विवश हो गया है?

आलोक फिर से मुट्ठी में,

अंधेरा लेकर रह गया है?

कौन गीता का अर्थ बताकर,

फिर अर्जुन को खड़ा करेगा?

कौन मोह से दूर ले जाकर,

जीवन का अर्थ कहेगा?

कब कोई भागीरथ मनुष्य के,

पूर्वजों की थाती को फिर से वर्तमान में लायेगा?

और एक बार फिर मनुष्य,

अपने कर्म पथ पर मुस्कुरा पाएगा?

— डॉ. आलोक चांटिया "रजनीश"