सड़क पर खड़ा हुआ एक आदमी,
हमको अच्छा लगता है।
जब वह उदास हो,
फटे कपड़े पहने हो,
पैरों में जूते भी ना हो ,
तो कुछ जानने का मन जगता है ।
पर उससे कभी डर नहीं लगता है ,
क्योंकि वह आपके अंदर स्वाभिमान और,
समाज में ऊंचा होने का भाव जगा जाता है।
जब उसकी पथरायी सी आंखों में,
कोई प्रश्न भरता है और एक,
खुला हुआ हाथ आपके सामने आता है।
ऐसा लगता है मानों दुनिया का सबसे ,
अमीर आदमी वह मुझे बना गया है ।
क्योंकि आपके दृष्टिकोण में आपके,
सामने भिखारी आ गया है।
चुपचाप जेब से एक, पांच,
₹10 निकाल कर दे देते हैं।
यह सोचकर कि आज आपने,
कुछ अच्छा कर लिया है।
धन्यवाद भी आप दे देते हैं भगवान को,
कि कम से कम उसने,
आपको ऐसा बनाया है ।
कि आपने किसी को चँद रुपया दे दिया है ।
पर आप कभी नहीं सोच पाते हैं ,
कि उस गरीबों के हाथ से छीन हुए रुपए,
उसके श्रम को ही आपने अपनी,
मुट्ठी में बंद कर लिया है।
इसीलिए आज वह एक प्रश्न बनकर,
आपके सामने जिया है।
पर आपको अभी भी उससे,
डर नहीं लगता है ।
पर जिस दिन उसे इस बात का,
आभास हो जाएगा ।
कि उसके श्रम का जमा हुआ हिस्सा ,
आपकी तिजोरी में रहता है।
और इसीलिए वह सड़कों पर ,
भूखा प्यास रहता है ।
उस दिन निश्चित रूप से आप,
उससे डर जाएंगे।
अराजकता आतंक की,
बात भी कर जाएंगे ।
पर आप यह नहीं मन पाएंगे?
कि आपके द्वारा मुट्ठी बंद कर लेने के,
कारण ही किसी ने अपनी मुट्ठी को,
पाने के लिए बंद करना आरंभ कर दिया है।
उसने गरीब होने का मंत्र आपसे ही लिया है ।
उस मंत्र का असर ना दिखाई दे,
इसलिए आदमी में आदमी,
देखने की बात होनी चाहिए।
हमारे जीवन से मानवता की,
बात नहीं खोनी चाहिए।
क्योंकि कण-कण में,
भगवान रहते हैं।
यह दर्शन वह भी समझना चाहता है ।
अपने हाथ में आपके जीवन से,
लक्ष्मी को पाना चाहता है।
हमें जल्दी ही एक जैसा मानव,
होने का प्रयोग आरंभ करना होगा।
अमीर गरीब उच्च नीच से हटकर,
सिर्फ समानता का बोध करना होगा।
हमें एक बार फिर सिर्फ और सिर्फ ,
आदमी बनना होगा ।
आलोक चांटिया "रजनीश"
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