Friday, October 31, 2025

नींद की यात्रा डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 हर कोई चाहता है,

सोने के बाद इस दुनिया की,

कोई बात याद ना रह जाए।

यहां तक की सपनों में भी, 

कोई ना आए ।

ताकि वह एक बार फिर वह, 

उस दुनिया से जुड़ जाए,

 जिसे छोड़कर वह ,

इस दुनिया में आया है ।

और बता सके उस परम तत्व को,

कि अभी तक उसने यहां क्या पाया है?

सुकून की गहरी नींद की,

यह यात्रा ही सुबह का,

सार बताने के लिए फिर से,

सूरज के किरण की,

दस्तक दे जाती है ।

सांसों की यह कहानी ,।

किसी दूर गगन से आने के बाद,

बस ऐसे ही चलती जाती है।

समझना आसान नहीं है,

इस तिलिस्म को ,

किसी के लिए भी यहां पर, 

जो समझ जाते हैं उनके लिए ही,

यह अपने सारे अर्थ बता जाती है ।

नींद एक बार जब ,

गहराई में डूब कर चली जाती है ,

तो शरीर तो यही छोड़ जाती है,

पर वह उस पिया से, 

मिलकर चली आती है।

जिसे देख पाना आसान कहां है?

किसी के लिए,

समय ही कहां है जो कोई, उ

सके लिए जिए ।

पर रोज यह नींद की कहानी,

 हमें यह बताती है ,

कि वह इस दुनिया में ,

उसी रास्ते से होकर आती है,

जहां से सांसों की यात्रा ,

इस पृथ्वी पर अपनी दस्तक दे जाती है ।

उपासना साधना तपस्या का,

यह मंत्र हमें वह रोज बताती है।

पर यह सुंदर बात हर व्यक्ति को,

कहां समझ में आती है? 

आलोक चांटिया रजनीश

मेरी कविता मेरी समीक्षा डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 

मुझको क्यों बनाया तुमने

कविता की समीक्षा

मेरे दर्द को क्यों उकेरा तुमने ,
क्यों अपने को दिखाया तुमने ,
कोई ख़ुशी मिली दरिया से तुम्हे ,
क्यों आँखों से आंसू बहाया तुमने ,
जमीं को दर्द देते देते आज क्यों ,
मुझे ही अपनी बातो से खोद गए ,
क्या कोई गुलाब खिलेगा कभी ,
कौन कलम आज बो गए मुझमे ,
एक बीज सा जीवन था मेरा ,
जो गिर कर भी कोपल देता है ,
क्यों पैरो से कुचल डाला तुमने ,
बस कुछ मिटटी ही तो लेता है ,
आज जान मिला जान का अर्थ ,
जब तुमने किया मुझसे अनर्थ ,
कोई बात नही स्याह में आलोक ,
अपने को उजाला बनाया तुमने ,
कह भी तो नही सकते धरती हूँ ,
हर सृजन को मैं भी करती हूँ ,
क्योकि मैं दुनिया में रहती हूँ ,
ये कैसा मुझको बनाया तुमने ,
माँ होकर भी आज कुचल गई है ,
मेरी ममता कही चली गयी है ,
किसी ने बताया है नाले के किनारे ,
माली ऐसा बीज क्यों लगाया तुमने ,
बंजर कहलाती मगर अपनी होती ,
जीती मगर अपने सपने में होती ,
अब तो जिन्दा लाश हूँ पानी में ,
मुझे साँसों बिन क्यों बनाया तुमने ।
डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

.आज न जाने कितने युवा सिर्फ इस लिए लडकियों का शोषण करते है क्योकि यह एक प्रतिस्पर्धात्मक खेल हो गया है .....पर वो लड़की भी इस ख़ुशी में कि कोई तो उसको पसंद करता है .....अपना सब कुछ समर्पित करती है ...पर परिणाम गर्भपात के बढ़ते बाज़ार और लड़कियों में बढती कुंठा जिसमे उनको विकास होने के बजाये एक डर का जन्म ज्यादा हो रहा है .....................
शायद आपको यह सिर्फ एक फर्जी बात लगे पर पाने को अंदर टटोल कर इसको पढ़िए और फिर?

इसकी समीक्षा एक शब्दार्थ उत्पन्न करती है

🌾 जब प्रेम खेल बन गया: स्त्री, समाज और सभ्यता का क्षरण

प्रस्तावना

कविता हमेशा समाज का आईना होती है। पर कभी-कभी यह आईना खून से लिखा जाता है। “मुझे साँसों बिन क्यों बनाया तुमने” — यह सवाल सिर्फ एक स्त्री का नहीं, बल्कि पूरी धरती का है, जो अपने ही बच्चों के हाथों कुचली जा रही है।

आज के युवा वर्ग में प्रेम, संवेदना और संबंध जैसे शब्द अक्सर प्रतिस्पर्धा, दिखावा, और वर्चस्व में बदल गए हैं। प्रेम एक भावना नहीं, बल्कि एक खेल बन गया है — जिसमें कोई जीतता नहीं, दोनों हारते हैं — एक अपनी अस्मिता से और दूसरा अपने मानवत्व से।

मानवशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य: जब संबंधों का बाज़ार बन गया

मानव सभ्यता में प्रेम हमेशा से सृजन का प्रतीक रहा है। किंतु आधुनिक उपभोक्तावादी समाज में प्रेम का स्वरूप बदल गया है।

अब यह ‘स्वामित्व’ और ‘प्रदर्शन’ का साधन बन गया है।

युवाओं में “कितने रिश्ते” और “कितनी जीत” जैसी मानसिकता ने संबंधों को प्रतियोगिता में बदल दिया है।

डिजिटल माध्यमों ने इस प्रवृत्ति को और गहराई दी है — जहाँ आकर्षण क्षणिक है, पर उसका असर जीवनपर्यंत।

इस सामाजिक विकृति ने स्त्रियों को एक “उपभोग्य वस्तु” के रूप में प्रस्तुत किया है, न कि एक सृजनकर्ता, संवेदना-स्रोत या व्यक्तित्व के रूप में।

स्त्री का दर्द: धरती के समान मौन पीड़ा

कविता में “माँ होकर भी आज कुचल गई है” — यह पंक्ति हर उस स्त्री का प्रतीक है जो समाज की क्रूरताओं के नीचे दबकर भी मुस्कुराती है।
वह धरती की तरह है —
जिसे बार-बार खोदा जाता है,
पर वह हर बार कोपल देती है।

किन्तु जब यह धरती भी मौन हो जाए — तो समझिए कि सभ्यता अपने अंतिम चरण में है।

मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: झूठी स्वीकृति की भूख

कई बार शोषण के पीछे सिर्फ वासना नहीं, बल्कि स्वीकृति की भूख होती है। युवाओं के भीतर प्रेम नहीं, बल्कि “मान्यता पाने” की लालसा पल रही है।
लड़कियाँ यह सोचती हैं कि “कोई तो है जो मुझे पसंद करता है”, और इस भ्रम में वे खुद को समर्पित कर देती हैं —
जबकि लड़के इस “जीत” को अपनी पुरुषत्व की ट्रॉफी मान लेते हैं।

परिणाम —

गर्भपात के बढ़ते मामले,

मानसिक अवसाद,

आत्म-सम्मान की गिरावट,

और सबसे भयावह — संवेदनशीलता का क्षय।

नैतिक और सांस्कृतिक पुनर्विचार की आवश्यकता

भारतीय संस्कृति में स्त्री को “शक्ति” कहा गया है — न कि “संपत्ति”।
जब समाज इस मूल दर्शन को भूल जाता है, तब विकास नहीं, विनाश शुरू होता है।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि “आधुनिकता” का अर्थ चरित्रहीन स्वतंत्रता नहीं है।
यदि हम सच्चे अर्थों में आधुनिक बनना चाहते हैं, तो सबसे पहले हमें संवेदना और मर्यादा को पुनर्स्थापित करना होगा।

निष्कर्ष: धरती और स्त्री — दोनों को सांस लेने दो

डॉ. आलोक चांटिया “रजनीश” की यह कविता एक चेतावनी है
धरती की बेटी बोल रही है, पर हम सुन नहीं रहे।
वह कहती है —

“अब तो जिन्दा लाश हूँ पानी में,
मुझे साँसों बिन क्यों बनाया तुमने।”

अगर समाज इस पुकार को नहीं सुनता, तो अगली पीढ़ियाँ सिर्फ तकनीकी रूप से जीवित होंगी —
भावनात्मक रूप से नहीं।

Thursday, October 30, 2025

एकांत और भगवान डॉक्टर आलोक चांटिया "रजनीश"


 मेरे कमरे के ठीक बाहर,

पूरा संसार चलता रहता है।

कभी कोई गाड़ी निकलती है,

कभी कोई ठेले वाला निकलता है।

कभी कुछ हंसने की, 

आवाज भी आ जाती है ।

कुछ देर को संसार की बातों से ,

जीवन की कई बातें ठहर सी जाती है ।

पर कमरे के अंदर भी तो,

एक दुनिया ही रहती है ।

जो यादों की दुनिया होती है,

बातों की दुनिया होती है, 

सोचने को मजबूर करती रहती है,

कि कल जिनके साथ मैं,

जी रहा था ।

जिनको मैं अपना कह रहा था।

आज जब वह मेरे जीवन में, 

कहीं नहीं रह गए हैं।

लौटने की बात भी,

फिर से नहीं कह गए हैं।

दिल दिमाग सब कुछ शायद,

उनकी छाप के साथ यही रह गए हैं ।

इसीलिए अब कोई नई तस्वीर मैं,

दिल में नहीं बना पाता हूं।

दिमाग में भी किसी के साथ,

नए जीवन की बात,

नहीं सोच पाता हूं ।

इसीलिए दो दुनिया के बीच मझधार में ,

अपने को खड़ा पाता हूं ।

कमरे की दुनिया से निकल कर,

कमरे की ठीक बाहर की, 

दुनिया में कहां आ पाता हूं?

यह सोचकर,

संतोष भी करना सीख गया हूं ।

कि मेरी तरह ही मंदिरों के,

दरवाजों के भीतर जो बंद रहता है।

संसार का हर आदमी ,

जिसे भगवान कहता है।

वह भी तो एकांत में रहकर ही,

दुनिया की प्रसन्नता को ,

देने का प्रयास करता रहता है।

खुद पत्थर की मूर्ति बन जाता है ।

लेकिन मुस्कुराता रहता है।

कब वह जिंदा लोगों के बीच,

अपने भी जीवन की,

कोई बात सुनने को पाता है।

जो भी आता है बस वह उसे,

पत्थर को भगवान कहकर, 

अपनी बात सुना जाता है।

एक बंद कमरे में भगवान भी ,

अपने कमरे की बाहर की दुनिया को,

कहां यह बात पाता है ,

कि जब तुमने मुझे,

मनुष्य सा ही समझ लिया है।

तो क्या कभी मुझे भी मेरे जीवन का,

थोड़ा सा हिस्सा मेरे लिए दिया है ।

बस यही सोच कर मैं कमरे में,

चुपचाप अपनी दुनिया में रह जाता हूं।

कमरे के बाहर दौड़ती भागती ,

दुनिया में मैं कुछ भी नहीं पाता हूं ।

शायद मैं भी भगवान बन जाता हूं ?

शायद मैं भी भगवान बन जाता हूं ?

आलोक चांटिया "रजनीश"

Saturday, October 25, 2025

जीवन पथ पर पिता डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

घर की दहलीज से निकलते हुए पैर,
तब अचानक ही रुक जाते हैं ।
जब वह कानों में ,
एक ऐसी आवाज पाते हैं।
जो कह रहा होता है,
क्या तुम्हारा जाना जरूरी है?
मुझे लगता है मेरी तबीयत,
कुछ खराब चल रही है, 

शरीर की सारी ऊर्जा ,
कुछ अजीब सी निकल रही है।
वहां लखनऊ में तुम्हारा,
ऐसा क्या काम है?
जो तुम्हारा जाना जरूरी है, 

जाते हुए पैर थम से जरूर जाते हैं।
पर वह कहां यह समझा पाते हैं ?
कि दो रोटी की तलाश,
हर पेट को रहती है।
सम्मान की बात,
हर आंख हर पाले रहती है।
हाथ फैला कर तो,
भीख भी मिल जाती है,
इस दुनिया में ।
पर पसीने की रोटी,
बड़ी मुश्किल से मिलती है। 

इसीलिए घर की दहलीज, 

छोड़ना जरूरी हो जाता है। 

वरना कोई अपनों को ,
कहां आसानी से छोड़ पाता है ?
लेकिन यह बात पिता को,
समझा पाना कोई आसान बात तो नहीं है?
क्योंकि आज मेरी मां इस दुनिया में ,
नश्वर शरीर से नहीं है ,
जो मुझे उंगली पकड़ कर,
यह समझा गई थी ।
और मेरे आश्वसन पर,
चुपचाप अपना उत्तर पा गई थी ।
कि किसी भी परिस्थिति में, 

आपके बाबू को मैं ,
छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।
जब भी वह आवाज देंगे ,
मैं बार-बार लौट कर आऊंगा।
भले ही कितने जीवन के, 

रिश्ते बिखर जाए टूट जाए।
मेरे हाथों से ही मेरे,
कल के सपने निकल जाए,
फिर भी मैं आपको,
निराश नहीं करूंगा।
मां मैं आपके बाबू के साथ,
हर पल रहूंगा ।
और फिर मैं दहलीज से निकले हुए,
पैर को वापस ले आता हूं।
मुस्कुराते हुए अपने पिता की ओर,
यह कह भी जाता हूं ,
नहीं ऐसा कोई जरूरी काम नहीं है,
मुझे लखनऊ में ।
आप कहते हैं तो मैं ,
यही और रह जाता हूं, बहराइच में ।
बस यह सुनते ही पिता को,

 एक अजीब सा सुकून मिल जाता है ।
और वह फिर से बेपरवाह हो जाते हैं ।
और मेरी तरफ से अपना,
ध्यान हटाकर फिर रूस यूक्रेन,
अफगानिस्तान पाकिस्तान की,
बहस में फंस जाते हैं ।
रिश्ते कई बार आपके ,
होने से ही स्थिर रह जाते हैं। 

बने रह जाते हैं ।
मंदिरों के देवता ,
जिंदा ही घर में मिल जाते हैं ।
इसीलिए अंधेरे में आलोक, 

सभी को बहुत भातें हैं। 

आलोक चांटिया रजनीश


Monday, October 20, 2025

दीपक का विद्रोह डॉ. आलोक चांटिया “रजनीश”

दीपक का विद्रोह

 डॉ. आलोक चांटिया “रजनीश”


अमावस की रात से लड़ने आ गया,

एक दीपक को भी आज जोश आ गया।

दुनिया का अंधेरा देखकर उसने भी,

आज खुद को ही आग लगा डाला।


पी गया अंधेरे का हाला —

सच है, चारों ओर अब था बस काला।

पर अमावस को क्या मालूम था,

किससे पाला पड़ा है आज निराला!


पूरी रात यूँ लड़ने का त्यौहार,

सिर्फ दीपक ही मना सकता है।

खुद को जलाकर दुनिया को,

उजाला बना सकता है।


मानव की संगत का यह प्रतिफल,

इससे सुंदर और क्या हो सकता है?

जिस मानव ने उसे रचा था,

आज उसी के काम वह आ सकता है।


सुबह क्या होगा — इसकी न चिंता,

ना कोई हिसाब, ना कोई सवेरा।

बस एक चिराग, अपनी लौ में डटा,

अंधियारी रात में बना सवेरा।


 

Sunday, October 19, 2025

दीपक कहता है आलोक चांटिया "रजनीश"



दीपक कहता है

सूरज का घमंड तोड़ने के लिए,

 मैं कभी नहीं जलता हूं।

 मुझे जलाकर तुम्हें खुशी मिलती है,

 इसलिए मैं जलता हूं ।

जानता हूं तुम स्वयं से,

 अंधेरा मिटाने की कोई, 

कोशिश नहीं करना चाहते हो।

 तुम सिर्फ उजाले के लिए, 

मेरे अंदर दुनिया भर का,

 अंधेरा समेटना चाहते हो ।

मैं भी जानता हूं कि तुम्हीं ने, 

अपने हाथों से कुम्हार बनकर,

 मेरी रचना को जन्म दिया है।

 तभी तो इस धरा पर ,

सभी ने मुझे दिया कहकर, 

उसका नाम लिया है।

 फिर कैसे अपने मालिक की इच्छा को,

 मैं महसूस ना कर पाऊं ?

ठीक है उजाला करने में मैं,

 कितना ही अंधेरा क्यों ना हो जाऊं ?

पर दर्द होता है जब तुम ,

झूठ बोलकर दुनिया से,

 यह रहते हो कि एक चिराग ,

 सूरज को रोशनी देने के लिए जलता है ।

कुछ घंटे के प्रकाश में ,

भला सूरज के बराबरी में,

 वह कहां मिलता है ?

लेकिन तुम्हें कभी भी, 

जिम्मेदारी लेने की ,

आदत नहीं रही है ।

कैसे कह दो चिराग के,

 सीने पर पैर रखकर तुमने,

 उजाले की कहानी कही है। 

फिर भी मैं चार दिवारी में,

 बंद औरत की तरह खुश हो जाता हूं।

 क्योंकि मैं भी तुम्हारे जीवन को एक,

 स्वर प्रदान करने के काम तो आता हूं ।

उजाले के इस जन्म लेने को, 

तुम बस याद करते रहना। 

अंधेरा मुझ में कितना छोड़ा,

 यह किसी से ना कहना। 

किसी से ना कहना ।

आलोक चांटिया "रजनीश"

 

Friday, October 17, 2025

एक दीपक मेरे लिए जलने जा रहा है आलोक चांटिया "रजनीश"


 आज एक दीपक,

मेरे लिए भी जलने जा रहा है ।

मेरे अंधेरे को,

अपने साथ ले जा रहा है। 

कितनी खूबसूरती से,

इस झूठ को छिपा ले गया। 

कि खुद के जीवन में ,

एक अंधेरा किया जा रहा है।

इतना आसान भी नहीं था, 

दूसरे के जीवन में रोशनी को फैला देना ।

एक दीपक अपने भीतर, 

अंधेरे को समेटे जा रहा था।

चाहते सभी हैं कोई दूसरा, 

मेरे जिंदगी में उजाला कर जाए ।

उसके जीवन में कितना, 

अंधेरा रह गया?

क्या कभी यह जान पाए? 

आलोक चांटिया "रजनीश"

Monday, October 13, 2025

चींटी की तरह कुचले जा रहे हो ,- आलोक चांटिया "रजनीश"

 


चींटी की तरह कुचले जा रहे हो ,
मेरी लाश से होकर कहा जा रहे हो ,
मैं भी तो निकली थी एक सपना लिए ,
मेरी हकीकत को भी मिटा जा रहे हो ,
सिर्फ मुझको मसलने के लिए ही क्यों ,
मेरे अस्तित्व तक को नकारे जा रहे हो ,
क्यों नही है दूर तक जाने का मेरा सच ,
बस अपने को अपनों में पुकारे जा रहे हो ,
मालूम है मेरे भी अपने रोते है न आने पर ,
मेरी शाम को क्यों आंसू दिए जा रहे हो ,
कहा ढूंढे मेरे होने के निशान इस दुनिया में ,
तुम हत्यारे होकर भी मुस्काए जा रहे हो ,
मेरी नियत यही तो न थी कि कोई मुझे मारे,
अपनी ख़ुशी में मेरी ख़ुशी क्यों जला रहे हो ,
मैं भी हसने के लिए तुझे से होकर ही गुजरी ,
अपने दामन से क्यों मुझे रगड़े जा रहे हो ,
कब तक चींटी कह कर मुझे मिटाते रहोगे ,
औरत को आज ये क्या दिखाते जा रहे हो ,
मेरी ही तरह तो है तेरी माँ भी घर में देखो ,
फिर मुझे मादा कह क्यों जलाते जा रहे हो
.आइये हम समझे इनका दर्द और कुछ बदल कर दिखाए इनका भी कल और आज ...........................आखिर ये है तभी तो है मेरा आपका वजूद
आलोक चांटिया" रजनीश"


Friday, October 10, 2025

सड़क पर खड़ा हुआ एक आदमी,- आलोक चांटिया "रजनीश"

 सड़क पर खड़ा हुआ एक आदमी,

हमको अच्छा लगता है।

जब वह उदास हो,

फटे कपड़े पहने हो,

पैरों में जूते भी ना हो ,

तो कुछ जानने का मन जगता है ।

पर उससे कभी डर नहीं लगता है ,

क्योंकि वह आपके अंदर स्वाभिमान और,

समाज में ऊंचा होने का भाव जगा जाता है।

जब उसकी पथरायी सी आंखों में,

कोई प्रश्न भरता है और एक,

खुला हुआ हाथ आपके सामने आता है।

ऐसा लगता है मानों दुनिया का सबसे ,

अमीर आदमी वह मुझे बना गया है ।

क्योंकि आपके दृष्टिकोण में आपके,

सामने भिखारी आ गया है। 

चुपचाप जेब से एक, पांच,

 ₹10 निकाल कर दे देते हैं।

यह सोचकर कि आज आपने,

कुछ अच्छा कर लिया है। 

धन्यवाद भी आप दे देते हैं भगवान को,

कि कम से कम उसने, 

आपको ऐसा बनाया है ।

कि आपने किसी को चँद रुपया दे दिया है ।

पर आप कभी नहीं सोच पाते हैं ,

कि उस गरीबों के हाथ से छीन हुए रुपए,

उसके श्रम को ही आपने अपनी,

मुट्ठी में बंद कर लिया है।

इसीलिए आज वह एक प्रश्न बनकर,

आपके सामने जिया है।

पर आपको अभी भी उससे,

डर नहीं लगता है ।

पर जिस दिन उसे इस बात का,

आभास हो जाएगा ।

कि उसके श्रम का जमा हुआ हिस्सा ,

आपकी तिजोरी में रहता है।

और इसीलिए वह सड़कों पर ,

भूखा प्यास रहता है ।

उस दिन निश्चित रूप से आप,

उससे डर जाएंगे। 

अराजकता आतंक की,

बात भी कर जाएंगे ।

पर आप यह नहीं मन पाएंगे?

कि आपके द्वारा मुट्ठी बंद कर लेने के,

कारण ही किसी ने अपनी मुट्ठी को,

पाने के लिए बंद करना आरंभ कर दिया है।

उसने गरीब होने का मंत्र आपसे ही लिया है ।

उस मंत्र का असर ना दिखाई दे,

इसलिए आदमी में आदमी, 

देखने की बात होनी चाहिए। 

हमारे जीवन से मानवता की,

बात नहीं खोनी चाहिए। 

क्योंकि कण-कण में, 

भगवान रहते हैं।

यह दर्शन वह भी समझना चाहता है ।

अपने हाथ में आपके जीवन से,

लक्ष्मी को पाना चाहता है।

हमें जल्दी ही एक जैसा मानव,

होने का प्रयोग आरंभ करना होगा।

अमीर गरीब उच्च नीच से हटकर,

सिर्फ समानता का बोध करना होगा।

हमें एक बार फिर सिर्फ और सिर्फ ,

आदमी बनना होगा ।

आलोक चांटिया "रजनीश"


Thursday, October 9, 2025

हर कोई बंद मुट्ठी का- आलोक चांटिया "रजनीश"


 

हर कोई बंद मुट्ठी का, 

भरोसा दिला जाता है। 

चुपचाप आता है ,
मुस्कुरा कर चला जाता है।

 दुनिया में सब मुट्ठी,
बांधकर ही आते हैं ।
क्योंकि भगवान के घर से हर कोई,
कुछ ना कुछ लाता है। 

इसीलिए लकीरें,
खिंच जाती हैं हथेलियां पर।
क्योंकि उनके भीतर न जाने,
क्या कुछ लिखा जाता है। 

बस इंतजार करना होता है, 

उन लकीरों पर लिखी हुई उन ,
लाइन के अर्थ को,
जो मिटाती है जीवन के तदर्थ को।
खुश भी हो जाता है मन, 

यह सोच सोच कर,
कि बंद मुट्ठी लेकर ही हर कोई आता है ।
पर मेरा तो मन ना जाने क्यों,
एक विचलन सा पाता है। 

जब बंद मुट्ठी का स्वर,
उसके कानों में आता है। 

क्योंकि मुट्ठी में भला उजाला,
कब कोई बांध पाया है?
मुट्ठी में तो सिर्फ,
अंधेरे का ही साया है। 

इसीलिए जब कोई इस संसार में,
गर्भ के अंधकार को,
चीरता हुआ आता है,
तो उसे गर्भ के अंधेरे को भी,
मुट्ठी में लेकर चला आता है।
क्योंकि गर्भ ही सब कुछ है, 

यही किलकारी में वह मान पाता है।
धीरे-धीरे जीवन की बढ़ती जटिलता में,
जब वह मुट्ठी को खोलता है,
इधर-उधर प्रकृति के साथ डोलता है।
तब जान पाता है कि,
मुट्ठी में बंद अंधेरे से,
जीवन को जिया नहीं जाता है।
कर्म के सिद्धांत पर चलते हुए,
उजाले को हाथ खोल कर लिया जाता है।
तभी जीवन का स्वर,
पूरा हो पाता है।
फिर भी इस सच से दूर हर पल ,
बंद मुट्ठी का सहारा लोग दे जाते हैं ।
सच कहूं तो अंधेरे के साथ, 

जीना सीखा जाते हैं।

 इसीलिए मुट्ठी को ताकत का,
सार कहा जाता है ।
खुली उंगली को,
लाचार कहा जाता है ।
पर सच तो इसका,
उल्टा ही होता है ।
जैसे-जैसे हाथ खुलता जाता है ।
अंधेरा दूर होता जाता है।

 उजाला नजदीक होता जाता है ।
यही अर्थ जब भी कोई,
समझ जाता है,
उसका जीवन पूरा हो जाता है ।
आलोक चांटिया "रजनीश"

जब भी मैंने तुम्हारी तरफ देखा है,-आलोक चांटिया रजनीश

 जब भी मैंने तुम्हारी तरफ देखा है,

तुमने बड़ी बेरुखी से मुझसे कहा है,

मेरे पास समय नहीं है।

समझने की लाख कोशिश के बाद भी,

यह समझना आसान नहीं है ,

कि उसके पास जीवन नहीं है।

क्योंकि उसके पास समय नहीं है ।

आज तक यही सुनता, 

समझता चला आया था।

समय जिसका प्रदर्शन करने का,

अवसर दे जाता है,।

वही तो जीवन कहलाता है।

जिनके जीवन में समय ही,

नहीं रह गया है ।

उसे मृतक के सिवा,

भला क्या कहा गया है?

गर् समय किसी के जीवन में ,

चलता रहता है ,

तभी तो वह अपने को,

 जीवित कहता रहता है।

पर जब देखो तब तुम,

यही मुझे बता जाते हो,

 अपने जीवन में समय,

न होने की बात दिखा जाते हो।

तो फिर मैं कैसे मान लूं,

कि तुम जीवन का अर्थ समझ पाते हो,

तुम तो न जाने कब के मर गए थे,

बस सिर्फ एक लाश की तरह ,

मेरे जीवन में रह जाते हो। 

और यह मैं सिर्फ तुम्हें,

नहीं बताने का जतन नहीं है ,

कि तुम्हारे पास जब समय नहीं है,

तो फिर जीवन ही कहां है? 

मैं तो अपने चारों तरफ,

उन सबको यह बता रहा हूं,

 उनको यह जता रहा हूं ,

कि जब तुम यह कहते हो,

मेरे पास समय नहीं है।

अपनी भूख भूल गए हो, 

अपनी प्यास भूल गए हो, 

सुबह से शाम तक दौड़ते रहते हो,

तो सोच कर देखो कि जिस,

शरीर को तुम जिंदा कह रहे हो !

क्या सच में तुम उसके साथ,

जिंदा रह रहे हो?

उसमें से समय तो तुमने,

न जाने कब का खो दिया है।

सिर्फ एक लाश को ढो लिया है।

समय का अर्थ तुम संबंधों के दायरे में,

कहां समझ पाए हो? 

इसीलिए मेरे पास समय नहीं है,

जिंदा शरीर में मैं कब का,

मर गया हूं यह कहते आए हो ।

पर कभी यह जान नहीं पाए हो।

आलोक चांटिया रजनीश


Friday, October 3, 2025

चींटी का दर्शन डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"


 एक चींटी लड़ती है मरती है, 

कटती है पर झुकती नहीं है। 

उसे जीवन जीने का,

अर्थ मालूम हो गया है।

कर्म ही सब कुछ है,

यही उसके साथ रह गया है।

निकल पड़ती है घर से, 

बिना कुचल जाने के डर से। 

जानती भी है कि हो सकता है,

कि शाम को घर भी ना लौट पाऊं ?

पर इस डर से कभी नहीं कहती,

कि मैं घर से बाहर क्यों जाऊं?

मनुष्य के पैर से कुचल जाने,

चीनी गुड़ और शहद में मिल जाने,

उसके लालच में कुछ ही पलों में,

मर जाने बंद धब्बों के अंधेरों में,

आजीवन कारावास की तरह ,

खत्म हो जाने का आभास भी,

उसे कहां डरा पाता है ?

वह जानती है कि उसके मृत्यु के बाद,

उसके हिस्से में ना किसी का,

दर्द आता है संवेदना आती है,

ना ही कोई उसके पास,

दुख जताने भी आता है, 

बस डिब्बे से निकालकर,

 उसके मृत्यु शरीर को ,

फेंक दिया जाता है ।

इतना अपमानित जीवन पाकर भी,

भला चींटी को कौन डरा पाता है ?

उसके हिस्से में नियत का वह,

अदम्य साहस आता है।

जिसमें मानव की संस्कृति में ,

अनगिनत असंख्य चीटियां का,

बलिदान चलता चला जाता है ।

मजबूर हो जाता है मनुष्य भी,

एक दिन इस चींटी के साथ चलने को,

अपने घर के सामानों में, 

उसके साथ रहने को। 

अनवरत चींटी का यह प्रयास उसे,

मानव के जीवन में शामिल कर देता है ।

और फिर एक दिन चींटी का संसार,

अपनी तरह का जीवन सुख स्वाद,

सब मनुष्य से ही लेता है।

 क्योंकि चींटी यह जान जाती है,

कि बिना कर्म के,

बिना त्याग के बलिदान के,

 बिना मौत के स्वागत के, 

सांसों के पथ पर मुक्ति नहीं आती है।

इसीलिए कुछ न होकर भी, 

अस्तित्व हीन की तरह रहकर भी,

एक चींटी अपनी तरह से, 

पूरा जीवन की जाती है।

और मानव के सामने खड़े होकर,

उसे यह समझा जाती है ,

कि जीवन का मूल्य ,

सिर्फ अकर्मण्य होकर बैठ जाना नहीं है।

हर दुख दर्द को सहते हुए,

 सिर्फ सुख पाना नहीं है।

कर्म को करते हुए मिट जाना ही ,

जीवन का अंतिम सार है।

 किसी भी प्राणी का यही अंतिम,

चेतना और आलोक प्रसार है।

आलोक चांटिया "रजनीश"