Sunday, November 30, 2025

मिट्टी और बीज का, कोई मेल कहां होता है?- आलोक चांटिया "रजनीश


 मिट्टी और बीज का,

कोई मेल कहां होता है?

रंग रूप गुण आकार प्रकार,

सब कुछ तो अलग होता है। 

फिर भी मिट्टी के साथ ही,

बीज के अंदर का ,

हर अर्थ छिपा होता है ।

बीज की दृष्टि यह पहचान जाती है ,

कि उसके जीवन की कहानी, 

मिट्टी से पहचानी जाती है।

वह कभी मिट्टी से,

दूरी नहीं बनाता है ।

उसे रंग रूप आकार प्रकार, 

में नहीं फसाता है।

समर्पित हो जाता है ,

मिट्टी के साथ जीवन जीने के लिए ,

तभी तो पृथ्वी पर प्रकृति ने,

 न जाने कितने अर्थ दिए।

अपने को जानवर से दूर करके,

आदमी भी बहुत दूर निकल आया है ।

पर उसने अपनों की ही बीच, 

एक ऐसा जगत बनाया है! 

जहां पर आदमी आदमी से, 

अलग दिखाई देने लगा है।

मिट्टी का शरीर पाकर भी, 

उसमें से भला कहां कुछ,

प्रेम सहयोग भाईचारा का,

अर्थ उगा पाया है ।

आलोक चांटिया "रजनीश"


Saturday, November 29, 2025

रिश्ते लौटते नहीं है डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 अब विवाह लोग अपने,

घरों से नहीं करते हैं।

सिर्फ और सिर्फ ज्यादातर, 

अपनी दहलीज पर मरते हैं।

क्योंकि विवाह के बाद के,

 संबंध अब स्थिर नहीं होते हैं।

इसीलिए लोग होटल पार्क, 

मैदान गेस्ट हाउस ढूंढ लेते हैं।

संबंध के नाम पर ,

उसी को घर का नाम देते हैं।

संबंध लाख ढूंढने पर फिर,

घर की तरफ लौट ही नहीं पाता है।

क्योंकि संबंधों का दायरा ही अपना,

जन्म घर के द्वारचार से नहीं,

होटल के रिसेप्शन से पाता है।

शहनाई की आवाज भी, 

होटल से आती है ।

सोहर बन्ना की गूंज ,

बड़ी-बड़ी महफिले पाती हैं।

कहां कोई अब,

ढोलक बजाता है ।

कहां घर के आंचल में लिपटी हुई,

औरतें कोई गाना बैठकर गाती हैं।

कहां कोई अपने बेटे बेटी के लिए,

सुंदर से गीत सुनाती हैं।

सब अब किराए के,

लोगों को लेकर चले आते हैं।

संबंध का यही अर्थ,

तो अब हम पाते हैं ।

कोई चाहता तक नहीं है कि,

मांग की लकीरें उसके, 

जीवन के अर्थ को,

दुनिया को बता जाएं ।

सौंदर्य के ललक में कुछ ,

ऐसा चल रहा है ,

कि उर्वशी मेनका भी शरमा जाए।

इसीलिए घरों में कमरे,

कम होने लगे हैं।

होटल और गेस्ट हाउस में, 

कमरों की संख्या बढ़ने लगी है ।

कुछ पल के लिए ही रिश्तेदार ,

रिश्ते चारों तरफ रहे।

तभी अच्छा लगता है ,

अब कोई भला रत जगा में, 

रात-रात कहां जगता है?

संबंध भी आत्मा की तरह, 

कपड़े बदलने वाला एक, 

सिलसिला होता जा रहा है।

आदमी आज फिर संस्कृति से ,

निकल पशु जगत में ,

खोता जा रहा है ।

अब घरों के दरवाजों से, 

विदाई का शोर सुनाई नहीं देता है ।

कोई किसी का हाथ पकड़ कर,

कार पर बिठा लेता है ।

लोग हाथ झाड़ कर फिर, 

अपने घरों को लौट आते हैं।

संबंध जो सड़क पर बनाए गए हैं ,

अब घर तक लौटकर नहीं आते हैं ।

आलोक चांटिया "रजनीश"


Monday, November 24, 2025

हर दर्द छुपा कर, मुस्कुराना था - आलोक चांटिया "रजनीश"

 

हर दर्द छुपा कर,
मुस्कुराना था ।
अच्छा होना तो ,
सिर्फ एक बहाना था।
सुबह शाम रात के बदलते,
रहने की तरह न जाने,
कितनों को मेरे ,
जीवन में आना था ।
ना जाने कितनों को ,
मेरे जीवन से जाना था ।
किसी के साथ,
रुकने का मन था ।
किसी को छोड़ जाना था। 

किसी का दरवाजा की तरफ,

 देखकर इंतजार करना था।

 किसी को सन्नाटे ,
रास्तों पर ढूंढ जाना था।
आसान था किसी के लिए,
यह कह देना कि,
झूठ है सब रिश्ता,
लगता है ऐसा सामानों की तरफ ,
दुनिया में सब कुछ,
कितना है सस्ता ।
पर भला किसे यह सब ,
अब बताना था ।
सच को झूठ ,
झूठ को सच कैसे बनाते हैं?
यही तो जाना था ।
जिनको अपना माना था,
वह सब झूठे निकलते चले गए ,
जिनको झूठा समझा था ,
वह अपने होते चले गए।
इस जादू के खेल को,
इस संसार में मैंने ,
पहली बार पहचाना था। 

आंखों से आंसू नहीं ,
सिर्फ जोर से खिल खिलाना था ।
क्योंकि हर दर्द को,
छुपा कर जी जाना था।
हंसना तो आज भी ,
एक बहाना था ।
क्यों है जीवन में कुछ,
ऐसा दर्द नहीं है,
बताते क्यों हैं कहता क्या,
जब हर किसी को दर्द से,
हाथ मिले हुए ही पाना था।
अपना दर्द दिखा कर ,
अपना प्रतिकर्षण,
क्यों बढ़ाना था ।
इसीलिए चुपचाप हर किसी को, 

देखकर मुस्कुराना था।
मैं एक अच्छा आदमी नहीं हूं ,
यही बताना था ।
पर इतना साफ सुनकर भी,
कोई कहां सच मान पाता है?
बचपन से जवानी बुढ़ापे तक,
झूठ को लेकर ही ,
ज्यादातर जीता है हर व्यक्ति,
इसीलिए सच को सच ,
कैसे मान पाना था?
चुपचाप मुस्कुराते रहना,
तो एक बहाना था ,
मुझे सिर्फ अपने भीतर,
एक दर्द छुपाना था।
डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

Friday, November 14, 2025

रिश्ते का हिसाब -डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 हर किसी के पास अपने

रिश्तों का हिसाब होता है।

दर्द-शिकायत का

एक कारवां भी बेहिसाब होता है।


जरा-से शब्द डोलते नहीं,

कि अचानक भीतर

एक हाहाकार होता है।


कोई पूछता है—

“तुमने मेरे लिए अब तक क्या किया?”

कोई सवाल करता है—

“तुमसे जुड़कर फायदा ही क्या मिला?”


क्या कभी तुमने

एक पल भी ठहरकर

मेरी ओर मुड़कर देखा?

कुछ को तो बस यही लगता है—

समय की बर्बादी से

ज़्यादा कुछ हासिल नहीं होता।


किसी को समझ पाना

वाकई मुश्किल होता है—

पर हर रिश्ते का हिसाब

ज़रूरी भी तो नहीं होता।


कुछ रिश्ते बस साथ-साथ

चलते रहने के लिए बने होते हैं;

यह हर दिल का छोटा-सा सपना होता है।

ज़रूरी नहीं कि

नापतोल कर चलें,

या किसी स्वार्थ-उद्देश्य के लिए

कभी मिलें।


बस इतना एहसास ही काफी है—

कि कोई कहीं दूर

मेरे लिए भी जी रहा है।

मिल नहीं पाता,

पर मिलने की बात

फिर भी करता है।


जब भी उससे मिलने की चर्चा आती है—

वह कहता है,

“अगली बार ज़रूर आऊंगा।

समय न भी मिला,

फिर भी कहीं से खोजकर ले आऊंगा।”


पर वह समय

आता ही नहीं।

दरवाज़ा उसकी आहट

सुन ही नहीं पाता।


और कोई चुपचाप

उस रिश्ते का इंतज़ार करता है—

जो है भी…

और नहीं भी।

जो एक झूठ भी है,

और एक सच भी।


बिना पानी के

पेड़ सूख जाता है।

बिना हवा के

दम घुट जाता है।

और फैलते हुए सन्नाटे को देखकर

कौन सच में समझ पाता है—

कि एक रिश्ता

उसका भी है,

और उससे जुड़ा

मेरा भी नाता है?


इसीलिए अक्सर

खुद से ही

एक अनकहा हिसाब चलता रहता है।

जहाँ रिश्ता न सामने होता है,

न कोई ख्वाब।

पर सवाल-जवाबों के बीच

एक एहसास—

बेहिसाब होता जाता है।


— आलोक चांटिया “रजनीश”

Thursday, November 6, 2025

जब वह कमरा खोलता है डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 

जब वह थक हार कर,
अपने कमरे को खोलता है,
फिर वहां उससे ,
कोई नहीं बोलता है।
एक सन्नाटा सा पसरा रहता है,
वहां सिर्फ कुछ फोटो ,
कुछ बिखरी हुई ,
किताबें के साथ डोलता है ।
न जाने कितने दर्द ,
पूरे दिन उसके फोन पर बहे।
लेकिन वह अपना दर्द, 

आलोक किससे कहे ।
रात दिन सब अपनी ही,
खुशी को ढूंढने की,
कोशिश करते रहे हैं ।
जिसे देखिए उसने ही बताया,
संघर्ष रोटी घर दर्द विवाह,
न जाने सबने सहे हैं।
बस इन्हीं सबको अब,
बहुत पीछे छोड़ आया है, 

इसीलिए इस भीड़ में उसने, 

एक भी ऐसा नहीं पाया है ,
जो यह सोचकर हिम्मत जुटा लेता ,
कि जिसको हम लोग दर्द का रहे हैं,
उसके बिना यह कैसे ,
हर पल रह रहे हैं ।
इसीलिए कमरे का सन्नाटा उसके,
दिल के सन्नाटे से जुड़कर, 

एक संगीत पैदा कर जाता है।
जब अकेलेपन का स्वर, 

अपने सुरों में एक गीत गाता है ।
पूरे शहर का दर्द सुनकर ,
जब लौट के कमरे पर आता है,
तो सुकून के रास्तों में ,

सिर्फ वह अपने साथ,
तन मन और सांसों को पाता है ।
क्योंकि वह जानता है कि, 

यही वह है जिससे ,
उसका सच्चा नाता है ।
यह जब तक रहेंगे,
तभी तक लोग भी उसे, 

जानने की कोशिश करते रहेंगे ।
अपने हर दर्द को बताने की,

 जताने की बात करते रहेंगे।
धड़कते दिल में अपने,
खून के अलावा सबके दर्द समेटकर,
फिर वह शहर से निकलकर ,

जब भी अपने कमरे पर आता है ,
और अपने अकेलेपन का ताला खोलता है ।
तो सच मानिए उस समय, 

उससे कोई नहीं बोलता है।
सिर्फ कमरे की दीवारें जो खुद,
अकेलेपन में नीरस जीवन के साथ ,
उसका इंतजार करती रहती हैं ।
वही मुस्कुरा कर ,
सिर्फ यह कहती है ।
कि अब कुछ देर दीवारों को भी ,
किसी के होने का एहसास तो रहेगा,
कोई इस कमरे को,
तनहा तो नहीं रहेगा ।
और वह मुस्कुरा कर,
उन दीवारों की तनहाई को, 

दूर करने में उलझ जाता है।
भला कमरा भी उसके, 

अकेलेपन को कहां समझ पाता है ?
उसके आने से विस्थापित होती हुई ,
शरीर से उस हवा का दबाव, 

कमरे में कुछ हलचल कर जाता है ।
एक रखा हुआ कागज ,
अपने आप गिर जाता है ।
एक दरवाजा उस दबाव से, 

अपने आप बंद हो जाता है।
बस एक अकेले आदमी के कमरे में,
आने से इतना ही हो पाता है।
दर्द सुनने वाले का दर्द ,
कोई नहीं जान पाता है ।
धूल पड़े हुए चूल्हे की,
आग कब जली थी ?
कोई जानना भी कहां चाहता है ?
सबके अपने जीवन का, 

अपना ही अलग-अलग रायता है ।
गैस वाला भी समझ नहीं पाता है ,
कि इस घर में आदमी रहता है ,
या कोई भगवान,
जिसका भूख से क्यों नहीं कोई नाता है।
वह कभी कबार पूछ भी लेता है,
भैया क्या गैस की कोई जरूरत नहीं है?
क्या आपके घर में ,
आपके सिवा कोई नहीं है?
यह सुनकर वह,

 मुस्कुराकर रह जाता है ।
फिर फोटो में रहती हुई, 

अपनी मां की तरफ देख लेता है ।
सूनी आंखों से जीवन का,

 अर्थ जता देता है ।
जिसमें उसका दर्द खो जाता है ,
और लोगों का दर्द रह जाता है ,
जिसको मिटाने का सपना, 

लेकर उसे चलना है ।
कल के सूरज के साथ फिर से ,
उसे भगवान से मिलना है।
अभी तो सूरज की तलाश में, 

दौड़ती रात से उसे मिलना है।
अभी उसे थोड़ा और चलना है।

आलोक चांटिया रजनीश

Tuesday, November 4, 2025

रोटी का भाग्य डॉक्टर आलोक चांटिया "रजनीश"


 शहर में आज फिर एक भूखा,

बिना रोटी के सो जाएगा।

शहर में रोटी तो थी पर,

वह भला उसे कहां पाएगा?

फुर्सत ही कहां है किसी को,

अपनी भूख के बाद,

दूसरे भूखे को ढूंढने की ।

बस घर से एक हाथ निकलेगा,

और एक रोटी का टुकड़ा,

सड़क पर फेंक दिया जाएगा।

पैसे से खरीदी गई,

रोटी का मोल भी कोई,

कैसे समझे ?

किसी किसान के पसीने से,

धरती फोड़ कर निकलने वाले,

दाने का दर्द कौन समझ पाएगा ?

समय ही कहां है किसी के पास,

कि शहर में कोई आज,

फिर से भूखा सो जाएगा?

उस घर के दरवाजे को,

ताकता हुआ जानवर,

फिर भी एक रोटी का जाएगा !

क्योंकि वह मनुष्य की, 

भावना को समझने लगा है।

इसीलिए वह एक टकटकी लगाकर,

घर के सामने जागने लगा है।

वह जानता है कि हाथ से, 

रोटी फेंकी तो जा सकती हैं। 

पर किसी भूखे को,

खिलाई नहीं जा सकती हैं!

जिस रोटी के न मिलने पर, 

उसने भगवान के आगे ,

आंसू गिरा कर पूछा था ?

कि मैं ऐसा कौन सा अपराध किया है ?

जो मेरे हाथ में एक,

रोटी भी नहीं आई है ।

पर पीड़ा के पार आज ,

जब उसके हाथ में रोटी है ,

तो उसे यह बात ,

स्वयं कहां समझ में आई है?

किसान के पसीने से निकलने वाले,

दानों में सिर्फ पैसे का, 

अहंकार नहीं होता है ।

उसके एक छोटे से प्रयास से,

शहर का कोई भूखा भी, 

रोटी खाकर सोता है ।

मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में जाने वाले,

एक बार भी भगवान को,

 सड़क के किनारे नहीं देख पाते हैं ।

जहां भगवान नहीं है,

वहां माथा टेक कर चले आते हैं ।

भूख मांगा करता है कि,

मुझे भूख लगी है एक रोटी दे दो !

आज इस तड़पते दिल से, 

थोड़ा सा सच्चा आशीर्वाद ले लो !

पर घर पहुंचने की जल्दी में, 

कोई कहां सोच पाता है कि,

उसके अनसुने पन से शहर में ,

एक भूखा सड़क पर,

पड़ी रोटी भी नहीं पाता है?

भगवान को पाने का ,

सरल सा तरीका,

तुम्हारे हाथ में आया था ,

पर तब तुमने भूखे को ,

कहां खाना खिलाया था ?

एक भूखा शहर में,

पानी पीकर फिर से सो लिया है ।

मानव की संस्कृति में ,

खेतों से निकली रोटी का टुकड़ा किसी,

गाय किसी कुत्ते के साथ हो लिया है।

डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"